'खाली पीली' के गाने पर लोग लाल-पीले, शर्म उनको मगर नहीं आती



-दिनेश ठाकुर
मुम्बइया फिल्म इंडस्ट्री में विवादों का मौसम चल रहा है। ‘दामिनी’ के सनी देओल की तर्ज पर कहा जाए तो ‘विवाद पर विवाद, विवाद पर विवाद, आजकल मुम्बई में कुछ हो रहा है तो बस, विवाद।’ ताजा विवाद निर्देशक मकबूल खान की नई फिल्म ‘खाली पीली’ के एक गाने को लेकर उठा है, जो हाल ही यूट्यूब पर जारी किया गया। ‘तम्मा-तम्मा’ (थानेदार) वाली तड़क-भड़क के साथ ईशान खट्टर और अनन्या पांडे पर फिल्माए गए इस गाने ‘तू जो कमर ये हिलाएगी, तुझे देखके गोरिया बियोन्से शरमा जाएगी’ के बोलों पर लोगों की भृकुटियां तनी हुई हैं। जनता के चढ़े हुए पारे का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि गाने को करीब सात लाख लोग डिसलाइक कर चुके हैं। सोशल मीडिया पर इसे अमरीकी पॉप स्टार बियोन्स नोल्स की शान में गुस्ताखी बताने के साथ रंगभेद से जोड़ा जा रहा है। अमरीका में रंगभेद को लेकर पहले से माहौल गरमाया हुआ है। ‘खाली पीली’ बनाने वालों को एहसास तो हो गया है कि उन्होंने यूट्यूब पर यह गाना डालकर गलत तारों को छेड़ दिया है। बियोन्स नोल्स ने अपनी बेटी ब्ल्यू ईवी के नाम के इस्तेमाल पर एक अमरीकी ईवेंट कंपनी को कॉपीराइट कानून के तहत अदालत के चक्कर कटवा दिए थे। इस जानकारी ने भी ‘खाली पीली’ वालों के होश उड़ा दिए हैं। मुमकिन है कि दो अक्टूबर को फिल्म के डिजिटल प्रीमियर से पहले गाने के बोल बदल दिए जाएं।

बेतुके बोलों वाला यह गाना कुमार और राज शेखर ने लिखा है। इस दौर के ज्यादातर गीतकार इसी तरह के गाने लिख रहे हैं। फिल्मों में गीत-संगीत कोमल भावनाओं से दूर होकर क्षणिक उत्तेजना का साधन बन गए हैं। पहले फिल्मों में गाने लिखने के लिए कवि या शायर होना जरूरी था। अब कोई भी यह काम निपटा सकता है। अश्लील और द्विअर्थी शब्दावली को लेकर आलोचना होती रहती है। इन्हें लिखने वाले चिकने घड़े हो गए हैं। सेंसर बोर्ड भी गोया ऐसे गानों को बगैर सुने हरी झंडी दिखा देता है। वर्ना ‘अपना टाइम आएगा’ (गली बॉय) में जो आपत्तिजनक शब्द था, उसे हटाया जाना चाहिए था। ‘रिंग रिंग रिंगा’ (स्लमडोग मिलिनेयर) के अंतरे की अश्लीलता जस की तस रही। यही मामला ‘कुंडी मत खड़काओ राजा’ (गब्बर इज बैक), ‘गुटुर गुटुर’ (दलाल), ‘आ रे प्रीतम प्यारे’ (राउडी राठौड़), ‘हलकट जवानी’ (हीरोइन), ‘रुकमणी रुकमणी’ (रोजा), ‘लैला तुझे लूट लेगी’ (शूटआइट एट वडाला), ‘राधा ऑन द डांस फ्लोर’ (स्टूडेंट्स ऑफ द ईयर) समेत कई और गानों के साथ रहा।

दरअसल, फिल्मों में संगीत अब साधना नहीं रहा, खालिस कारोबार बन गया है। पुराने गानों में अगर मेलोडी, सादगी और भावनाओं पर जोर था तो अब पश्चिमी वाद्यों के शोर और बेतुकी शब्दावली से काम चलाया जा रहा है। संगीत के साथ जुड़ी आस्था, कलात्मकता और आध्यात्मिकता से फिल्मी गाने काफी पहले आजाद हो चुके हैं। फिल्म संगीत सिर्फ शरीर हो गया है, आत्मा गायब है। आज के गीतकार और संगीतकार तर्क देते हैं कि इन दिनों जो पसंद किया जाता है, वे वही दे रहे हैं। जमीन से कटा उनका यह तर्क मजबूरी से ज्यादा उनके मानसिक बंजरपन को रेखांकित करता है।



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